नारद उवाच

Tuesday, June 12, 2007

नारद द्वारा कड़ी कार्यवाही

नारायण! नारायण!
साथियों,
हिन्दी चिट्ठाकारी मे अब वो दोस्ताना माहौल नही रहा। लोग यहाँ पर एक दूसरे के विरुद्द नाम लेकर गाली गलौच करने लगे है। हम किसी चिट्ठाकार का चिट्ठा तो बन्द नही करा सकते लेकिन नारद के माहौल को साफ़ सुथरा रखने के लिए उस चिट्ठाकार का चिट्ठा नारद से हटा सकते है। आज ही हमे एक ऐसा कड़ा फैसला हमे लेना पड़ा है। नारद सलाहकार समिति की संतुति पर "बाजार पर अवैध अतिक्रमण" नाम का चिट्ठा नारद से तुरन्त प्रभाव से हटा दिया है। क्योंकि इस चिट्ठे ने जिस भाषा का प्रयोग किया था वो सर्वथा अनुचित था। अब कड़े फैसले लेने का वक्त आ गया है।

वहाँ पर पंगेबाज के नाम से टिप्पणी करने वाले को भी सावधान किया जाता है कि अपनी भाषा पर नियन्त्रण रखें। बदतमीजी कतई बर्दाश्त नही की जाएगी, चाहे वो कोई भी हो। हम इन्टरनैट पर हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए एक साथ है, लेकिन यदि किसी भी तरह की गलत भाषा सहन नही की जाएगी। आशा है हमारे इस फैसले मे सभी चिट्ठाकार हमारे साथ है।

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53 Comments:

  • सही समय पर लिया गया एकदम सही फैसला। इस तरह के चिट्ठे चिट्ठाजगत के भाईचारे को बिगाड़कर जहर घोलने का कार्य करते हैं। यह कदम स्वागत योग्य है।

    मैं नारद सलाहकार समिति की इस निर्णय के लिए प्रशंसा करता हूँ तथा अपना धन्यवाद व्यक्त करता हूँ। मेरा नारद सलाहकार समिति से अनुरोध है कि आगे से सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाले चिट्ठों को नारद पर प्रवेश ही न दिया जाए।

    आशा है अन्य चिट्ठे भी इससे सबक लेंगे तथा भाषा में संयम बरतेंगे। मेरा निजी तौर पर भी सभी चिट्ठाकारों से अनुरोध है कि चिट्ठाजगत के सौहार्द को बनाए रखें और यदि किसी को अपने सांप्रदायिक विद्वेषपूर्ण जहरीले विचार ही परोसने हैं तो कृपया स्वविवेक से खुद ही नारद से अलग हो जाएं।

    By Blogger Shrish, At 10:42 AM  

  • सही फैसला

    By Blogger Beji, At 10:44 AM  

  • उचित कदम,

    अगर समय पर ऐसे कडें फैसले होते तो ये दिन देखने की नौबत ही न आती।

    उचित फैसले की बधाई स्‍वीकार करें।

    By Blogger mahashakti, At 10:51 AM  

  • आदि पत्रकार नारद मुनि जी आपकी चिंता जायज है चिटठाकारी में हमारे जैसे कमअक्‍ल चिटठाकार भी “बंदर के हांथ में तलवार” लेकर आ गये हैं और विवशता यह है कि अति उत्‍साह एवं प्रवंचना के दर्प नें हमें अंधा बना दिया है जो चश्‍मा आप सीनियर लोगों को दिखाना चाहिए वह कई बार हमें नसीब नही हो पाता हालांकि आप सभी सीनियर विवादित मसले पर टिप्‍पणी अवश्‍य करते हैं जो एक चिटठाकार का पथप्रदर्शन करते हैं तुलसीदास जी नें भी कहा है “सठ सुधरहि सत संगत पाई” पर एक जगह उन्‍होंने ही कहा है “मूरख हिरदय न चेत जिमि गुरू मिलहिं बिरंच सम !“ यह सब मैं स्‍वयं अपने संबंध में कह रहा हूं मैनें आपके न तो बहिष्‍कृत चिटठे को पढा है न ही संभावित बहिष्‍कृत होने वाले चिटठे को पढा है । आप सभी ज्ञानवान है आपकी टिप्‍पणियां हर सठ को सुधार देंगी और मूरख का सचमुच में नारद में स्‍थान रिक्‍त हो जाना चाहिए ।

    By Blogger Sanjeeva Tiwari, At 10:55 AM  

  • This post has been removed by the author.

    By Blogger अरुण, At 11:08 AM  

  • इसमें सोचने की कोई बात ही नही है। अभद्रता किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नही हो सकती..
    कवि कुलवंत

    By Blogger Kavi Kulwant, At 11:12 AM  

  • देर से लिया गया सही कदम. भशा हमेशा सँयत होने चाहिये. अक्षर "ब्रह्म" है यह बात जने कब समझेंगे कतिपय लोग. अशा है भविष्य में समय रहते कदम उठाये जायेंगे.

    By Blogger Gaurav Pratap, At 11:13 AM  

  • अच्छा कदम,आज मै पहली बार नारद के न्याय से संतुष्ट हुआ,यह जो भी बंधु पंगेबाज के नाम से जो कार्य कर रहे है वह भी नितांत अनुचित है,मै चाहता हू की वे सामने आये और जो कहना हो कहे पर अपनी जुम्मेदारी पर,कार्यवाही भदौरिया जी पर भी होनी चाहिये,जो नितांत गाली गलौच पर उतर आते है,और मै उम्मीद रखुगा कि अब यह कार्यक्रम जारी रहेगा,आने वाले वक्त मे चाहे कोई भी हो उनके खिलाफ़ भी होना चाहिये,यह नही कि गर कोई किसी धर्म जाती विषेश को गालिया देता है तो स्वीकार्य है,व्यक्ती विशेष को देता है तो कार्यवाही

    By Blogger अरुण, At 11:19 AM  

  • मुनिवर!
    "बाजार पर अवैध आक्रमण" को मैने देखना ही छोड़ दिया था किन्तु आपने उन्हे बहिष्कृत करके मुझे उनके दर्शन करने के लिये कारण दे दिया। शायद आज उनका अन्तिम दर्शन हो।

    By Blogger अनुनाद सिंह, At 11:41 AM  

  • अच्छा किया!

    असभ्यता बर्दास्त नहीं !

    By Blogger रंजन, At 12:12 PM  

  • मुनिवर

    आपने बहुत सही निर्णय लिया. अपना विचार अपनी जगह है, लेकिन अन्य लोगों के कन्धों पर उसे दागना उचित नहीं है -- शास्त्री जे सी फिलिप

    By Blogger Shastri J C Philip, At 1:03 PM  

  • बहुत सही निर्णय, मैं आपके इस कार्य की सराहना करता हूँ। बहुत पहले यह कार्य हो जाना चाहिये था.... खैर देर अब भी नहीं हुई।
    देर आये दूरस्त आये....।

    By Blogger Sagar Chand Nahar, At 1:06 PM  

  • शत प्रतिशत सही निर्णय, हम यहां हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये हैं ना कि वर्जित शब्दावाली प्रयोग कर हिन्दी को गर्त में ले जाने के लिये ।

    By Blogger Bhupendra Raghav, At 1:57 PM  

  • बाजार पर अवैध अतिक्रमण की यह पोस्ट मैंने पढ़ी थी। बहुत बचकानी/बेहूदी भाषा इस्तेमाल की गयी थी कुछ चिट्ठाकारों के बारे में। लिखने वाला सक्षम लेखक लगता है और कुछ ब्लागरों से उसकी नाराजगी है। लेकिन कड़ी से कड़ी बात भी संयत भाषा में कही जा सकती है। कम से कम जब किसी के खिलाफ़ खुले आम लिख रहे हैं तो यह ख्याल तो रखना ही चाहिये। वैसे मैं नारद जी की इस बात से इत्तफ़ाक नहीं रखता कि हिंदी चिट्ठाकारी में अब वो दोस्ताना नहीं रहा। आम तौर पर लोगों के रिश्ते दोस्ताना ही हैं। इस तरह की अप्रिय घटनायें अपवाद हैं।

    By Blogger अनूप शुक्ला, At 2:01 PM  

  • यह सिर्फ जरूरी नहीं, अनिवार्य फैसला था. कुछ लोग ब्लोगिन्ग के जरिये वही राजनीति करने की कोशिश भी कर रहे हैं जो हिंदी साहित्य में पिछले सौ साल से होती आ रही है और जिसके जरिये कुछ लोग एक-दो किताबें लिख कर स्वनामधन्य आलोचक हो गए तो कुछ गाली-गलौच लिख कर और यौन कुंठाओं को अभिव्यक्ति देकर महान क्रांतिकारी कवि-कथाकार. भारतीय राजनीति की गंदंगी से अगर अभिव्यक्ति माध्यमों को बचाना है तो ऎसी कार्रवाई करनी ही पडेगी. चिट्ठाकारी को अगर सार्थकता देनी है और इसे अराजकता से बचाना है तो भी यह जरूरी है.
    इष्ट देव सांकृत्यायन

    By Blogger Isht Deo Sankrityaayan, At 2:08 PM  

  • नारद संचालको के इस निर्णय का स्वागत करता हूँ. साथ ही आशा करता हूँ आगे से किसी भी चिट्ठे के साथ ऐसी नौबत नहीं आएगी तथा आपसी सौहार्द बना रहेगा.

    By Blogger संजय बेंगाणी, At 2:12 PM  

  • नारद के मंच पर शालीनता हर हालत में बनी रहनी चाहिए. नारद को राजनीतिक पर्चेबाज़ी का अड्डा बनने से भी रोकें.

    मेरी राय में नारद की पहचान राष्ट्रभाषा में विचार-विनिमय के एक व्यापक मंच के रूप में है. आशा है आगे भी इसकी यही पहचान रहेगी.

    By Blogger Hindi Blogger, At 2:19 PM  

  • सही निर्णय है। शिष्ट और संयत भाषा में भी अपनी बात कही जा सकती है।

    By Blogger Laxmi N. Gupta, At 2:20 PM  

  • नारद का यह ऐतिहासिक फैसला कई मायनों में अहम है. नारद की यह भूमिका स्वागत योग्य है. उम्मीद करता हूँ कि भविष्य में भी यह समभाव से सभी पर लागू होता रहेगा.

    By Blogger Udan Tashtari, At 2:22 PM  

  • बहुत ही सही निर्णय।

    By Anonymous Jagdish Bhatia, At 2:38 PM  

  • सही निर्णय, सलाहकार समिति को धन्यवाद।

    By Anonymous अतुल शर्मा, At 2:43 PM  

  • not only this i would also like to draw attention on the comments that are being posted . on my blog i am getting comments that have no relevence to the poem but is directed to me in person this shpuld be also avoided

    By Blogger Rachna Singh, At 3:28 PM  

  • मैं बाजार पर अवैध अतिक्रमण के लिखे का विरोध करता हूं. इस का विरोध में उनके चिठ्ठे पर भी कर चुका हूं

    पर क्या हम एक सैंसरशिप नहीं थोपने जारहे हैं?
    कल को और भी छोटी छोटी बातें होंगी.

    मैं तो इस कदम का विरोध करता हूं

    By Blogger dhurvirodhi, At 4:18 PM  

  • ये आपलोगों को क्‍या हो गया है? हिंदी की हिमायत और हौसलाअफज़ाई के नाम पर क्‍या आप अपनी भाषा के विमर्श की पूरी परंपरा से बाहर करना चाहते हैं? जिस भाषा का प्रयोग राहुल उर्फ बजारवाला ने किया है, उसकी पूरी औघड़ परंपरा रही है। कोई क्राइम नहीं किया राहुल ने। अपनी बात कही। परेशान होकर। दुखी होकर। उसकी मंशा सांप्रदायिक ताक़तों को मदद पहुंचाने वाली ताक़तों के विरोध की रही है और ये एक पवित्र मंशा है। इस मंशा की अभिव्‍यक्ति को आप अपने डंडे से खामोश करना चाहते हैं... तो यक़ीन मानिए कि इस वक्‍त का इतिहास जो भविष्‍य में लिखा जाएगा, आप सब खलनायक साबित होंगे। जिस आधार पर आपने राहुल पर कार्रवाई की, उसी आधार पर आपको संजय बेंगाणी और पंगेबाज़ पर भी कार्रवाई करनी चाहिए। क्‍योंकि इनकी भाषा में राहुल से ज्‍यादा तिक्‍तताएं आ चुकी हैं। लेकिन आप सब लोग जिस ध्रुवीकरण के तहत लामबंद होकर राहुल के बजार नंबर एक को निकाल बाहर करना चाहते हैं, ज़ाहिर यही होता है कि आप सब सांप्रदायिक हैं और मोदी जैसी फसलों को इस देश में लहलहाते हुए देखना चाहते हैं। बेंगाणी बंधुओं के प्रति हमारी हमदर्दी है, लेकिन उनकी श्रेष्‍ठता इसी बात में निहित होगी कि वे व्‍यापक लोकतंत्र का सम्‍मान करते हुए बजार से प्रतिबंध के खिलाफ अपील करें। हम किसी हिटलरी अनुशासन के खिलाफ हैं... और नारद द्वारा की जाने वाली कड़ी कार्यवाही का पुरज़ोर विरोध करते हैं। इस विरोध में अपनी आवाज़ देने के लिए उन सबसे अपील करते हैं, जो व्‍यापक मनुष्‍यता के पक्षधर हैं। धुरविरोधी जी आपका धन्‍यवाद, कि आपने बजार से अपनी असहमतियों के बावजूद इस फैसले का विरोध करने की पहल की।

    By Anonymous अविनाश, At 4:34 PM  

  • अविनाश जी,
    पहली बात, हमने बाजार वाले का ब्लॉग नही बन्द करवाया, बल्कि अपने घर को साफ़ किया है। इसमे सेन्सरशिप कैसी? स्वतन्त्रता के नाम पर हम किसी को भी किसी भी प्रकार की भाषा प्रयोग करने दें? लोग एक दूसरे को गालियां देते फिरे?

    नही...लोग अपने ब्लॉग पर गालियां दे, लेकिन नारद के मंच का प्रयोग ना करें। आप अपने ब्लॉग पर कूड़ा करकट, गन्द सन्द जो चाहे सो लिखिए, लेकिन नारद से अपने ब्लॉग को हटाने की संतुति करने के बाद।

    रही बात बैंगानी की उनकी भाषा फिर से देख लीजिएगा। विचारधारा अलग हो सकती है, लेकिन विरोध और भाषा संयत होनी बहुत जरुरी है। रही बात पंगेबाज की, पंगेबाज पर एडावाइजरी की कड़ी नजर है, हमारी नजर मे सब बराबर है, चाहे वो कोई भी हो।

    कृपया इस खर पतवार की साफ़ सफ़ाई को सेन्सरशिप का नाम मत दें।

    By Blogger Jitendra Chaudhary, At 5:02 PM  

  • खरपतवार की सफ़ाई जरुरी ही है।
    जब हम शालीन भाषा का प्रयोग नही कर सकते तो फ़िर किसी सार्वजनिक मंच पर कैसे रह सकते हैं।

    By Blogger Sanjeet Tripathi, At 5:08 PM  

  • सेसंरशीप का मै विरोध करता हूं, लेकिन यह मानता हूं कि यह एक सही फैसला है।

    संयत भाषा मे आलोचना किजिये, कौन मना करता है। इस तरह की भाषा का प्रयोग करेंगे तो बहिष्कृत होने के लिये तैयार रहीये।

    इस ब्लाग मे जो भाषा प्रयोग की गयी है वो औघड़ तो कतई नही है। आप किसी के विचारो से दूःखी है, हो भी सकते है। हो सकता है कि आपकी भावनाओ को ठेस पहुंची हो, इसका मतलब यह नही कि आप इस निम्न स्तरिय भाषा पर उतर आयें।

    ये तर्क भी मेरे समझ से परे है आपका समर्थन करे तो धर्म निरपेक्ष और विरोध करे तो सांप्रदायिक !

    आप लोकतंत्र की बात करे रहे है तो देख लिजीये अभी तक विरोध मे सिर्फ २ ही स्वर उठे है।

    एक व्यक्ति का निर्णय हिटलरी होता है सामुदायिक नही !

    By Anonymous आशीष, At 5:28 PM  

  • संयत भाषा के क्‍या मानक हैं? कबीर की कहनी को भी सेंसर करने की बात करने वाले यथास्थितिवादियों की पूरी जमात थी उनके वक्‍त में। कबीर ने भी कहा था- पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़, ता चढि मुल्‍ला बांग दे क्‍या बहरा हुआ खुदाय। इस भाषा को आप क्‍या कहेंगे। लेकिन इतिहास ने कबीर को ज्‍यादा जगह दी, उनका विरोध करने वालों को हाशिये पर फेंक दिया। जीतेंद्र जी, आप ये न भूलें कि आपका काम सिर्फ एग्रीगेटर का है, पक्ष और विपक्ष का नहीं है। और परिवार का क्‍या होता है- आप संवेदनशीलता की आड़ में तकनीक से खेल नहीं कर सकते। विचारधारा का विरोध और सभ्‍यताओं का संघर्ष आपके हमारे वक्‍त की एक ज़रूरी स्थिति है, इसको समझिए। एग्रीगेटर के माध्‍यम से आप सभी पक्षों के नरम और उग्र वक्‍तव्‍यों को आने-जाने दीजिए, रोकिए मत। और आप किसी के ब्‍लॉग को खर-पतवार कैसे कह सकते हैं- ये कौन-सी भाषा है? क्‍या इसे भी हम गाली की श्रेणी में रखें? जैसे राहुल ने बेंगाणी बंधुओं के संदर्भ में नैपकिन का इस्‍तेमाल किया? आप ये ग़लत कह रहे हैं कि आपकी नज़र में सब बराबर हैं। आपकी टिप्‍पणियों से भी ये बात ज़ाहिर नहीं होती है। प्रतिबंध लगाने का हक़ आपको नहीं है। इसका मतलब नारद परिवार के सदस्‍यों के विवेक पर आपको भरोसा नहीं। जो उन्‍हें बुरा लगेगा, वे खुद ही उसका विरोध करेंगे। नहीं जाएंगे उनके चिट्ठे पर। जैसे मोहल्‍ले में लोग नहीं आते, टिप्‍पणियां नहीं करते- जिनमें आप और अनूप शुक्‍ला भी अब शामिल हैं। ऐसा ही बजार के साथ भी करते। ऐसे ब्‍लॉग से असहमति का एक साझा मंच तैयार करते, न कि नारद से ही इन्‍हें साफ करने का निर्णय लेते।
    भाई आशीष, हिटलर का समर्थन करने वाले भी उनके वक्‍त में बहुत थे। आरएसएस वाले तो अब भी समर्थन करते हैं।

    By Anonymous अविनाश, At 5:47 PM  

  • अविनाश जी
    संयत भाषा के क्‍या मानक हैं? इस प्रश्न का एक जवाब मै देता हूं !

    वह भाषा जो आप और मै अपने घर मे अपने घर वालो के साथ प्रयोग कर सके !

    By Anonymous आशीष, At 6:02 PM  

  • आशीष, घर एक प्राइवेट स्‍पेस है... और हम वर्चुअल स्‍पेस में बात कर रहे हैं। इतनी सी समझ से तो आपको वाकिफ होना ही चाहिए। भाषाओं का मानकीकरण एक बड़ा मसला है- इसका जवाब इतनी आसानी से नहीं दिया जा सकता, जिस आसानी से आपने दे दिया है। धन्‍यवाद।

    By Anonymous अविनाश, At 6:54 PM  

  • 30 टिप्‍पणियों से ऐसा समां बंधा हुआ है, लगता है मानो अभी-अभी शत्रु देश के जहाजी हमले के विरुद्ध समूचा देश समभाव से अपना विरोध जताने इकट्ठा हुआ है! किसी भी वजह से हो ऐसी नाटकीयता हमेशा मुझे डरावनी लगती है!.. मैंने वह पोस्‍ट पढ़ा नहीं है, और न उस ब्‍लॉग से ज्‍यादा परिचित हूं जिसके बहिष्‍कार में यहां कोरस गान हो रहा है.. मगर, मेरी समझ में, वह मसला नहीं है.. हो सकता है वह पोस्‍ट और उसकी भाषा दो कौड़ी की और परले दरजे के घटियापे से लबरेज हो.. मुझे मालूम नहीं मैं सिर्फ़ अनुमान कर रहा हूं.. तो हिंदी की वक़ालत के नाम पर नारद क्‍या करेगा उसे उठाकर बाहर फेंक देगा?.. हो सकता है वह बाईस साल के किसी बच्‍चे की नासमझ ज़बान की फूहड़ बेवक़ूफी हो तो उसे उसकी यह सज़ा मिलनी चाहिए? यह किसी भी सूरत में आप लोगों को जायज़ फ़ैसला लगता है?.. यह इतना ही न्‍यायोचित है तो फिर इसे किसी अजाने-गुमनाम ब्‍लॉगर पर आरोपित करके आप कहीं कमज़ोर की गरदन उमेंठने का आसान रास्‍ता तो नहीं चुन रहे?.. सबक सीखाने के ऐसे मौक़े पहले भी बने थे तब इस रास्‍ते का इस्‍तेमाल करने से नारद बचता क्‍यों रहा फिर?..
    किसी भी रूप में सोचकर आपलोगों का यह फ़ैसला मुझे विवेकसंगत और जिम्‍मेदारी भरा नहीं लगता! ऐसी घटनाएं नारद को सिर्फ़ छोटा बनाएंगी.. बड़प्‍पन तो कहीं से ज़ाहिर न होगा.

    By Blogger Pramod Singh, At 7:05 PM  

  • नारद जी नमस्कार
    बात हीट गई तो सोची हम भी कह ही दें । पहली और आख़री बात तो जे ब्लोग को बैन करने की बात हमे गलत लगी ।
    और फिर भैये ऎसी कछु गलत सलत बात सोई बा मोडा ने नई कई हती । अगर जे भाषा आप लोगन खों भ्रष्ट लग रही है तो फिर हमारे ब्लोग को सोई कछु दिनन में हटाने पाडे । कायसे की हम ठैरे बुन्देलखंडी । जब नों एक वाक्य में तीन चार स्तुति गान ना होयें तो लगतई नैयां के कछु कह रहे हैं । कोई भाई साहब जा सोई के रहे थे कि घर के बोलचाल की भाषा वे चाहत हैं, तो भैया आपके कुवैत मैं बोलत हुयैँ सीधी सरल भाषा हम ठेरे गाँव खेडे के जोवानहार पोकी पोकी भाषा ही बोल लिख पाते तो फिर कहूं और ना होते । वैसे भडास जैसे ब्लोग खों सोई देख लो उते सोई भाषा को भदेषपन ख़ूब चर्रा रौ पडो है ।

    By Blogger sachin, At 7:21 PM  

  • चलिए लिहाज करने या बदनाम होने के डर को धत्ता बताते हुए अंतत: आपने सफ़ाई की शुरुआत तो की. बधाई!

    नारद कोई एग्रीगेटर मात्र नहीं है, बल्कि इसने हिंदी ब्लॉगिंग के बिरवे को लहलहाता पौधा बनाने में सबसे प्रमुख भूमिका निभाई है. ख़ाली एग्रीगेटर तो हमारे जैसा 'आईटी में पैदल' इंसान भी आधे घंटे में तैयार कर सकता है, लेकिन नारद वाला सम्मान उसे बिल्कुल नहीं मिल सकता. याद करें कि कैसे नारद के अपने सर्वर के लिए कुछ ही दिनों में हज़ार डॉलर जमा हो गए थे. आधे से ज़्यादा पैसा भारत के सीमित आमदनी वाले हिंदी ब्लॉगरों ने जुटाया था. कहने का मतलब ये कि नारद हिंदी में जानकारी और सूचना बाँटने का एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्लेटफ़ार्म है, और किसी भी सार्वजनिक स्थल पर, किसी भी सामाजिक मंच पर, शालीनता बरती ही जानी चाहिए.

    पश्चिमी देशों में सब कुछ खुला है लेकिन वहाँ भी टीवी के लिए एक वाटरशेड टाइम निश्चित है(आमतौर पर रात के नौ बजे), उसके बाद ही एफ़-वर्ड या सी-वर्ड का प्रयोग बर्दाश्त किया जाएगा. 'निग्गर' शब्द के प्रयोग पर अभी पिछले हफ़्ते बिग ब्रदर हाउस से एक मोहतरमा को बाहर फेंका गया. अमरीका में तो किसी अश्वेत को निग्गर संबोधित कर आप आराम से अपने लिए जेल जाने का इंतज़ाम कर सकते हैं. पश्चिमी देशों में भी फ़िल्मों को सर्टिफ़िकेट देने की व्यवस्था है. न सिर्फ़ व्यवस्था है, बल्कि उसे कड़ाई से लागू भी किया जाता है. लंदन-पेरिस में वयस्कों की फ़िल्में देखने की कोशिश करते बच्चों की उम्र का पता करने के लिए उनसे टिकट खिड़की पर आई-कार्ड माँगा जाना आम बात है. पश्चिमी देशों में भी वयस्कों की पत्रिकाओं को आम ग्राहकों की नज़र से बचा कर रखने के निर्देश हैं, यानि अलमारी के ऊपर वाले हिस्से में. नीचे रखना चाहें तो उस पर काली जिल्द इस तरह लपेटें कि कोई तस्वीर या वयस्क संवाद नहीं, बल्कि सिर्फ़ पत्रिका का नाम-दाम दिखे. पश्चिमी देशों में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है लेकिन यदि आप धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाले या सामाजिक समरसता को तोड़ने वाले बयान देते हैं तो जेल में जाने के लिए तैयार रहना होगा. इसी तरह नितांत व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप को हर सभ्य समाज में बुरा माना जाता है. यहाँ तक कि पश्चिमी देशों के नेता तक सार्वजनिक मंच पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से बचते हैं.(पश्चिम की बात इसलिए की है, क्योंकि भारत में हर तरह के अतिवाद को जायज़ ठहराने के लिए यूरोप-अमरीका की बात की जाती है.)

    हम ब्लू फ़िल्म प्रदर्शित करेंगे जिसे देखना है देखे, नहीं देखना है नहीं... ...हमारे देवी-देवता छक कर सोमरस पीते थे, तो हमें खुलेआम पी कर टल्ली होने की इजाज़त क्यों नहीं... ... क्यों वेतन मिलने के दिन ठेके को बंद रखते हो, हमारी कमाई है हम पीएँ या जो करें... ... सहस्त्राब्दियों से हमारे यहाँ शिव लिंग की पूजा होती है तो फिर हम देवताओं की तस्वीर में यौनांगों को क्यों नहीं चित्रित करें... ...घर की चहारदिवारी के भीतर रतिक्रीड़ा में डूबे रहने वालों हमें नेहरु पार्क में काम-किलोल करने से क्यों रोकते हो... ...?????

    भाइयों, आपके उपरोक्त सवाल सुनने के बाद यही कहूँगा कि सभ्यता की न भी मानें तो भी, परंपरा को देखते हुए आपको ऐसा करने से बचना ही होगा. समाज कतिपय बंधनों या मान्यताओं के बिना नहीं चल सकता. न पूरब का समाज, न पश्चिम का समाज और न ही निहायत कबायली समाज! घर में भले नंगे नहाते हों, नदी के तट पर गमछा लपेट कर ही आना उचित होगा.

    नारद का विस्तार जिस गति से हो रहा है, आप सबके सामने है. लेकिन नारद जैसा था, जैसा है, वैसा ही बना रहे तो बेहतर. लाल या भगवा एग्रीगेटर, 'सिर्फ़ वयस्कों के लिए' टाइप सामग्रियों का या औघड़ी बोली वाला एग्रीगेटर अलग से भी बनाया जा सकता है. कितना आसान है एक एग्रीगेटर बनाना!

    साहसिक क़दम उठाने के लिए नारद जी को एक बार फिर धन्यवाद!

    By Anonymous बेनाम, At 7:57 PM  

  • भाई अविनाश, जिस औघड़पने की परंपरा की बात आप कर रहे हो उसका हमें भी कुछ अंदाजा है। और हम बेंगाणी बंधुओं का लिखा तब से पढ़ते आ रहे हैं जब आपने ब्लाग लिखना शुरू भी नहीं किया था। बाजार वाले राहुल जी ने जिस भाषा का उपयोग किया उसके बिना भी वो बेंगाणी बंधुओं के खिलाफ़ लिख सकते थे और ज्यादा बेहतर लिख सकते थे। लेकिन उनको औघड़पना ही पसंद है जिसे हम नहीं समझ पाये इसलिये उनके ब्लाग की पोस्ट को नारद में नहीं दिखाया जायेगा। नारद की कोई औकात नहीं है किसी के लिखने पर कोई प्रतिबंध लगाये। राहुल को जो मन आये वे लिखें आपको जो मन में आये वो लिखें। जिसको मन में आये वो पढ़ें भी। हम जिसको गली मोहल्ले की गंदगी समझते हैं, शायद अज्ञानतावश, उसको साफ़ न कर सकें लेकिन अपने दरवाजे बंद करने का हक तो हमें है। पवित्र मंशा है तो लिखने में भी कुछ पवित्र लहजा रखना चाहिये।
    अगर इसे आप नारद के लोगों की तानाशाही मानते हैं तो मानिये लेकिन तानाशाही और हमारे अपने चुनाव के अधिकार में घालमेल मत करिये। नारद में किसी ब्लाग का रजिस्ट्रेशन हुआ बाद में वह निरस्त कर दिया गया। अब इसको अपवित्र मंशा समझते हो तो आपकी समझ में हम कौन होते हैं दखल देने वाले! बाकी अगर बाजार वाले राहुल अच्छा लिखते हैं तो उनको किसी नारद-फ़ारद का मोहताज होने की जरूरत नहीं है।
    अब इसे चाहे हमारा छद्म समझो या कुछ और लेकिन सच है कि तमाम बेहतरीन लेखों (कल कर्मेंन्दु का बहुत अच्छा लेख था उसपर) के बावजूद हम मोहल्ले पर टिप्पणी करने से कतराते हैं। ऐसा नहीं है कि हम कोई वहां के लोगों से डरते हैं या घृणा करते हैं लेकिन जैसा मोहल्ले के परिचयात्मक लेखों का रुख रहा उसके चलते दूर से ही नमस्कार करना पसंद करते हैं। और जानकारी के लिये बता दें कि बहुसंख्यक ब्लागर इसीलिये मोहल्ले के लेख पढ़ते नहीं। अब आप इसे अगर तमाम ब्लागरों की कम अक्ली मानते हों तो मानते रहें और कामना करें कि प्रबुद्ध पाठक सामने आयें। बाजार या किसी और ब्लाग पर प्रतिबंध लगाकर न हमें कोई गद्दी मिल जायेगी न कोई रुतबा हासिल हो जायेगा। वस्तुत: यह बहुत अप्रिय निर्णय है जो हमें लेना पड़ा। नारद की इस निर्णय प्रक्रिया से संबद्ध होने के कारण मुझे इसका अफ़सोस है लेकिन यह जरूरी समझा गया इसलिये किया गया।

    मैं फिर कह रहा हूं नारद केवल एक नोटिस बोर्ड है। वह इस प्रतिबंधित ब्लाग की पोस्टों की सूचना नहीं देगा। इसके अलावा न राहुल भाई के लिखने पर कोई बंदिश लगा सकता है नारद न उनको प्रतिक्रिया करने से रोक सकता है। पढ़ने के लिये आप उनका पता याद रखिये।

    आपके विरोध की बात नोट की गयी। मैंने यथासंभव अपनी बात कहने का प्रयास किया। इसपर भी आपको लगता है कि यह तानाशाही तो आप कोई भी धारणा बनाने के लिये स्वतंत्र हैं।

    प्रमोदजी राहुल की पोस्टें आप पढ़ लें। अगर राहुल को लिखना है तो दो ब्लाग उनके और हैं। एक बाजार और दूसरा यूपी की पाती। उसमें लिखें। अभिव्यक्ति के लिये दो ब्लाग बहुत हैं। इसके अलावा अविनाश का मोहल्ला है। नये की गरदन ऐंठने जैसी कोई बात नहीं है। हां यह निर्णय अप्रिय है लेकिन ऐसा नहीं कि राहुल की जबान काट ली गयी है या मुंह सिल दिया गया हो। बाइस साल के नौजवान के तीन में एक ब्लाग को बंद किया गया है। अगर राहुल लिखना चाहता है तो लिखने के लिये दो ब्लाग बहुत हैं।

    धुरविरोधीकी चिंता जायज कि कल को और बातें होंगी।देखिये कब तक इससे बच सकते हैं।

    By Blogger अनूप शुक्ला, At 8:19 PM  

  • भाई अनूप जी, लेख और इंटरव्यू में फर्क होता है. ठीक उसी तरह, जैसे डाट काम और ब्लाग में फर्क होता है. बाकी की आपकी टिप्पणी पर कल बात होगी. मोहल्ले पर.

    By Anonymous अविनाश, At 8:51 PM  

  • कुछ लोगों की आदत है कि जब भी इस तरह की कोई बात चले उसे बैन और सैंसरशिप का नाम देने लगेंगे और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का झंडा उठा लेंगे।

    पहली बात उपरोक्त ब्लॉग को बंद नहीं किया गया है और न किया जा सकता है। ब्लॉगर और वर्डप्रैस.कॉम आदि ब्लॉगिंग सेवाएं ही किसी ब्लॉग को बंद कर सकती हैं। कोई और नहीं। ब्लॉग बंद नहीं हुआ है लिखने वाले को जो लिखना है लिखता रहे। जिनको पढ़ना है वे ब्लॉग पर जाकर पढ़ सकते हैं या फीड सबस्क्राइब कर सकते हैं। फिर इतने महान लेखक को नारद जैसे माध्यम की जरुरत क्या है? इसकी जरुरत तो हम जैसे सामान्य ब्लॉगरों को है।

    नारद सलाहकार समिति किसी भी ब्लॉग को न बंद कर सकती है न कर सकेगी, हाँ चूंकि नारद एक पवित्र भावना से काम कर रहा है तो उसे हक है कि वह कुत्सित इरादे वाले ब्लॉगों को स्थान न दे।

    माना आपने अपने गांव/शहर में रचनात्मक उद्देश्य से एक मंच, एक समूह बनाया है अब कोई उसमें आकर अराजकता पैदा करे तो आप उसे हटाएंगे न या कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रकता के नाम पर उसे झेलते रहेंगे।


    नैट पर सैकड़ों फोरम और ग्रुप हैं सब में अनुशासन हेतु नियम होते हैं। इस तरह के नियम न हों तो वो एक दिन न चल पाएं। कुछ साथियों का नैट का अनुभव सीमित है अतः वे इस तरह की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं।

    असल में बात वही है जैसा ऊपर इष्ट देव जी ने कहा"

    कुछ लोग ब्लोगिन्ग के जरिये वही राजनीति करने की कोशिश भी कर रहे हैं जो हिंदी साहित्य में पिछले सौ साल से होती आ रही है और जिसके जरिये कुछ लोग एक-दो किताबें लिख कर स्वनामधन्य आलोचक हो गए तो कुछ गाली-गलौच लिख कर और यौन कुंठाओं को अभिव्यक्ति देकर महान क्रांतिकारी कवि-कथाकार.

    इस तरह के लोगों को अच्छा लिखना तो आता नहीं अतः घटिया, विवादास्पद लिखकर सनसनी फैलाकर प्रसिद्ध होना चाहते हैं। जिसको अच्छा लिखना आता है वो खुद ब खुद सबकी नजरों में आ जाता है। फुरसतिया जी, समीरलाल जी, सुनील जी और रविरतलामी जी आदि इसके उदाहरण हैं। और तो और अच्छा लिखने वाले को रिकॉग्नाइज होने के लिए ज्यादा वक्त भी नहीं चाहिए होता। समीर जी ने अपनी चिट्ठाकारी के आरंभ में ही ख्याति अर्जित करनी शुरु कर दी थी, हाल ही में आए ज्ञानदत्त जी और काकेश आदि जैसे लोग भी इस बात को साबित कर रहे हैं।

    जिन लोगों को अच्छा लिखना नहीं आता वे ही इस तरह का घटिया लेखन कर सबका ध्यान खींचना चाहते हैं और खुद को महान साबित करना चाहते हैं।

    मैं यह नहीं कहता कि वे लोग अपनी इस शानदार शैली में न लिखें बस यह कहना चाहता हूँ कि वे नारद से खुद को स्वविवेक से अलग कर लें और अपना कालजयी लेखन जारी रखें। अगर वह सही होंगे, पठनीय होंगे तो लोग उनको खुद ही पढ़ने आते रहेंगे।

    By Blogger Shrish, At 2:27 AM  

  • साथ ही मुझे एक बात अब भी समझ नहीं आती कि जो लोग समझते हैं कि दुनिया के महानतम लेखक वही हैं और उनके सिवा सब मूर्ख हैं, उन्हें नारद की जरुरत क्या है। एक तरफ तो वे इसका फायदा उठाना चाहते हैं दूसरी तरफ इसको गरियाते भी हैं।

    जो लोग यह सोचते हैं कि वे बहुत ही महान लेखक और विचारक हैं, दुनिया में बस अकेले उनको ही अक्ल है हम सब तो बेअक्ल हैं। भाषा की, साहित्य की और ब्लॉगिंग की बस उनको ही समझ है और उनको छोड़कर सब संघी हैं, हिन्दूवादी हैं, कट्टरवादी हैं, एकमात्र धर्मनिरपेक्ष वही हैं, अल्पसंख्यकों के मसीहा वही हैं। उनको मेरी सलाह है कि वे अपना एक अलग ब्लॉग एग्रीगेटर बना लें जिस पर सिर्फ इस तरह के जहर परोसने वाले, सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाले, व्यक्तिगत आक्षेप करने वाले, गाली-गलौच वाले, अश्लील सामग्री वाले एडल्ट ब्लॉग, कथित औघड़ी भाषा वाले और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर गंदगी परोसने वाले ब्लॉगों को ही शामिल करें। उनके जैसी विचारधारा वाले सब लोग वहाँ चले जाएं, सभी वहाँ आपस में जितना मर्जी कुश्ती करें।

    कृपया मेरे कथित महान ब्लॉगर साथी इस बात को सीरियसली लें। एग्रीगेटर बनाना कोई बड़ी बात नहीं।

    By Blogger Shrish, At 2:31 AM  

  • भाई अविनाश,चलो इसी बहाने ये पता चला कि ब्लाग और डाट.काम में अन्तर होता है। हमें भी लेख और इंटरव्यू का अन्तर कुछ दिन में शायद पता चल जायेगा। :) वैसे आपकी टिप्पणी का इंतजार है।

    By Blogger अनूप शुक्ला, At 2:38 AM  

  • निम्नस्तरीय भाषा कौन सुधारेगा , कौन उसे दरबान बन कर रोकेगा ? पूरा चिट्ठा हटाना गलत है। क्या हटाने का फैसला लेने के पहले चिट्ठेकार से सम्पर्क किया गया ? उसके पक्ष की सुनवाई हुई ? 'नारद' एक साथ पुलिस और जल्लाद दोनों बन गया ? अलोकतांत्रिक फैसले लोकतांत्रिक तरीके से नहीं लिए जाते । निर्णय अपने आप में बेमानी है । बेमानी है इसलिए खतरनाक नहीं है, चिट्ठेकारों का व्यापक समर्थन मिला तब वह चिट्ठेकारी के लिए नुकसानदेह साबित होगा । मैंने एक चिट्ठे पर अभद्र भाषा के खिलाफ़ एक बार शिकायत 'नारद' के संचालकों से की थी । वह प्रविष्टी अन्तत: चिट्ठेकार ने हटा ली थी,ब्लॉग नहीं हटा था । निन्दा ,असहमति ,आलोचना का स्थान सेन्सरशिप न ले तो बेहतर होगा। किसी को चोट पहुँचाने वाले लेखन का समाधान भी सेन्सरशिप नहीं है । मुझे भी वह पोस्ट अच्छी नही लगी है।नारद के संचालक यह गौर करें कि नैसर्गिक न्याय नहीं किया गया(सामने का पक्ष सुनना) और हड़बड़ी में फैसला हुआ है इसलिए नारद संचालक पुनर्विचार का विकल्प खुला रखें । इससे ज्यादा घटिया लेखन पहले भी हुआ है लेकिन सेन्सरशिप नहीं हुई- इससे हिन्दी चिट्ठेकारी का लाभ हुआ। कई चिट्ठे कई पाठकों ने पढ़ने बन्द कर दिए। दरबानगिरी एग्रीगेटर की साख न गिराए।
    'नारद ' के लिए किसने चन्दा दिया,नहीं दिया इसे भी इस बहस में लाना अनुचित होगा ।

    By Anonymous अफ़लातून, At 3:27 AM  

  • हमने नियमानुसार कार्यवाही की है, ब्लॉग लेखक, पंजीकरण करते समय, नारद के नियमों को मानने के पूर्व स्वीकृति देता है। इसलिस स्वतन्त्रता का हनन जैसी बातों को करने का कोई मतलब नही।

    अफ़लातून जी, ब्लॉग लेखक की पोस्ट पर कमेन्ट करके उसको हटाने की रिक्वेस्ट की गयी थी, उन्होने लेख नही हटाया, लेकिन हमारी टिप्पणी माडरेशन मे एप्रूव कर दी, इसका क्या मतलब होता है, हटाने के समय इमेल की गयी उनको जिसको उन्होने जवाब नही दिया।

    रही बात, नारद एडवाइजरी के निर्णय की, नियमानुसार रहिए, तो साथ रहेंगे, नही तो आप अपनी राह अलग चुनिए। नियम सभी पर समान रुप से लागू होगे। नारद तब भी था, जब द्स ब्लॉग थे, नारद तब भी रहेगा, जब दस हजार सौ ब्लॉग रहेंगे। हमने कार्यवाही करने मे देर की, सोच रहे थे कि लोग सेल्फ़ सेन्सरशिप लागू करेंगे, लेकिन नही, लोग तो इसे गाली गलौच का मंच बनाना चाहते है, तो बनाइए अपना ब्लॉग, लेकिन नारद के दरवाजे ऐसे ब्लॉग्स के लिए बन्द होंगे, जो कुत्सित इरादों से इधर का रुख करेंगे। जो बन्दा भाषा की मर्यादा का पालन नही कर सकता, मेरी नज़र मे उसे सार्वजनिक मंच पर लिखने/बोलने का कोई हक नही।

    बहस करते रहिए, लेकिन भाषा की मर्यादा का पालन करते हुए।

    By Blogger Jitendra Chaudhary, At 4:43 AM  

  • जीतेंदरजी आपने जो किया बहुत सही किया. पर व्यक्तिगत तौर पर कहना चाहता हूं कि कुछ लोग जो चिट्ठाकारी में राशन-पानी लेकर इसीलिये उतरे हैं कि २४ घंटे मोदी को ही गरिया सकें उनके खिलाफ़ भी कोई कदम उठाना चाहिये. बेंगानी बंधु के बारे में जो लोग दुष्प्रचार कर रहे हैं वे जान लें कि उन्होंने इतने लोगों द्वारा लगातार हमले किये जाने के बावजूद भी अपनी भाषा में शालीनता बनाये रखी और कभी अपनी तरफ़ से पहल कर किसी पर भी ताबड़तोड़ हमले नहीं किये. आज मेरे प्रदेश का मुख्यमंत्री भगवा पार्टी का है और मान लो मैं उसका समर्थक हूं तो ये महाशय तो अगले दिन से शायद राशन पानी लेकर मुझ पर भी पिल पड़ें. और ये तथाकथित बुद्धिजीवी शायद ये समझते हैं कि इस पूरे ब्रह्मांड में मोदी को गाली देते रहने से ही लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा हो सकेगी. विसंगतियां दुनियां में अनगिनत हैं अनगिनत और नेता दूसरे धर्म के प्रति असहिष्णु हो सकते हैं पर आपके जीवन का तो शायद एक ही उद्देश्य बन गया है. और एक बात कहना चाहूंगा कि ये महाशय बेंगानी बंधुओं पर हमले करने में मोदी पर हमला करने का सुख पा जाते हैं क्योंकि मोदी तो इनका ब्लाग पढ़ेगा नहीं और इनको लगता है कि मोदी नहीं तो गुजरातियों को ही गरिया लो. इससे शायद इनकी कुंठा की तुष्टि होती होगी.

    By Blogger भुवनेश शर्मा, At 5:01 AM  

  • खुद को पहरेदार और दरोगा मान लिया जीतेन्द्र चौधरीजी ने ? संचालक मण्डल ने खुद को सेन्सर बोर्ड मान लिया ?
    फिर इतने अच्छे चिट्ठाकार जह पहरेदारी में लग जाएँगे तब उनके लेखन से भी वंचित होना पड़ेगा।

    By Blogger Aflatoon, At 5:04 AM  

  • सही फैसला है।

    By Blogger ग़रिमा, At 5:05 AM  

  • खुद को पहरेदार और दरोगा मान लिया जीतेन्द्र चौधरीजी ने ? संचालक मण्डल ने खुद को सेन्सर बोर्ड मान लिया ?
    फिर इतने अच्छे चिट्ठाकार जह पहरेदारी में लग जाएँगे तब उनके लेखन से भी वंचित होना पड़ेगा।


    अफ़लातून जी, इसमे जीतेन्द्र चौधरी कहाँ से इन्वाल्व हो गए भाई, ये फैसला नारद एडवाइजरी का है। दूसरी बात, स्वतन्त्रता का मतलब ये नही होता कि लोग सड़क पर खड़े होकर गालियां दे। पहले कई बार ऐसा सहन किया गया है, इसलिए लोगो ने इसे कमजोरी समझ लिया था, लेकिन अब नही, हमे माहौल को साफ़ सुथरा रखना है। हो सकता है ये फैसला आपको कड़ुवा लगा हो, लेकिन जनाब ऐसा फैसला कभी ना कभी तो लेना ही था, कब तक आप ब्लॉगिंग को गाली गलौच का अखाड़ा बनते देखते रहेंगे।

    रही बात लेखन की, जल्द ही वापस एक्टिव होंगे, हम तो ब्लॉग एक्सप्रेस है, अगर लिखेंगे तो रफ़्तार से, नही तो यार्ड मे खड़े रहेंगे।

    By Blogger Jitendra Chaudhary, At 5:15 AM  

  • सही फ़ैसला , वैसे मैने आज तक बाजार वाला देखा नही लेकिन अभी भुवनेश मेरे साथ लाइन पर हैं , उनसे मैने इसका लिंक लिया है. विचार भले ही अलग-२ हों लेकिन भाषा का स्तर घटिया बिल्कुल नही होना चाहिये .

    By Blogger DR PRABHAT TANDON, At 5:25 AM  

  • internet ki dunia se lambe samay se jura ho. kafi samay se blog vaigerah Bhi dekh raha ho. pahale kabhi react nahi kiya bavjud iske ki avinash jaise kai blogers dost he. rahul k blog ko narad se hatane ka virodh jarori he. narad k is kadam ko tanashahi ki hi sangya di ja sakati he.
    shashi bhushan dwivedi
    mahan kathakar

    By Blogger shashi, At 6:27 AM  

  • "अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता" का रोना रोने वाले शब्दजाल फैलाकर बरी हो जाने के फिराक में हैं। मेरे खयाल से स्वतन्त्रता की सबसे व्यापक परिभाषा ये है:

    "तुम्हारी स्वतन्त्रता वहीं खत्म हो जाती है, जहाँ मेरी स्वतन्त्रता शुरू होती है।"

    सीधे-सीधे कहें तो ये कि हर चीज सीमा में ही अच्छी रहती है।

    By Blogger अनुनाद सिंह, At 7:27 AM  

  • भाई जिन लोगों को बहुत पीड़ा हो रही है राहुल के चिट्ठे को हटाने से वे अपना चिट्ठा नारद से हटवा देवें । विरोध का सबसे बढ़िया तरीका यही हो सकता है।
    इसके लिये सुनो नारद एट जीमेल डॉट कॉम को मेल कर देवें।

    By Anonymous अनाम, At 11:15 AM  

  • इधर कमेंट में , और उधर खुद अगली पोस्‍ट ही इस चिट्ठे पर चिट्ठाकारों को को उकसा रही है कि वे मेल भेजकर अपना ब्‍लॉग हटवा लें ये बेहद खतरनाक ट्रेंड है कि यदि आपको हमारी राय, हरकत या विचार पसंद नहीं तो हट जाओ...क्‍यों भई क्‍यों हट जाएं। हमारा इस फैसले से विरोध रहा और इसे व्‍यक्‍त भी यहीं करेंगे ठीक वैसे ही जैसे लोगों के अनर्गन लिखने से विरोध रहा और इसे जैसे तैसे यहीं व्‍यक्‍त किया और आगे करेंगे।

    भाषा की बात खूब रही...राहुल की भाषा तो उनके अपने चिट्ठे पर थी यहॉं तो देखें अगली पोस्‍ट इस सामूहिक चिट्ठे पर, खुलेआम ध्‍मकी की भाषा और एक व्‍यकित के ही विरुद्ध नहीं वरन हर असहमत स्‍वर के विरुद्ध...
    हमारी असहमति दर्ज की जाए

    By Blogger masijeevi, At 3:47 PM  

  • गलत बिलकुल गलत किया आपने नारद जी. यह टीक नहीं कि आप लाटी लेकर यह तय करें कि कौन क्या लिखता-बोलता है. बेशक नारद आपका है मगर आप एक मिनट रुकें और अपने से सवाल करें कि क्या नारद अब सिर्फ़ आप ही का है? और क्या हम ऐसे समय में रह रहे हैं कि कोई असहमति हमसे सहन ही नहीं होगी? तो क्या हमें अपने से नहीं पूछ लेना चाहिए एक बार कि हममें कितनी आदमीय्त बची रह गयी है? आपने बिलकुल गलत किया राहुल को हटा कर और एस पर मेरी असमति दर्ज की जाये. हम राहुल के साथ हैं.

    By Blogger Reyaz-ul-haque, At 4:57 PM  

  • घटिया भाषा का प्रयोग करने के लिए नारद सही जगह नहीं है। हाँ कंस, भस्मासुर अथवा रावण नाम का एग्रीगेटर बना कर उस पर ऐसी बातें की जा सकती हैं। नारद के इस निर्णय का मैं समर्थन करता हूँ तथा आशा करता हूँ कि मुद्दों पर अच्छी भाषा में अच्छा और तगड़ा विरोध हो, न कि छिछली और ओछी भाषा में व्यक्तिगत आक्षेप।

    मुनिवर, इन बालकों की नादानियों को क्षमा कर दीजिएगा, तथा तनिक भी निराश मत होइएगा।

    By Blogger अभिनव, At 7:31 AM  

  • go to hell narad ,सुना है ना,तो फ़िर जाओ

    By Anonymous Anonymous, At 8:51 AM  

  • बहुत सही निर्णय। जितनी तारीफ करें कम है।

    By Blogger रवीन्द्र रंजन, At 6:25 PM  

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